पटना : बिहार की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अब प्रशासनिक स्तर पर भी बदलाव के संकेत दिखाई देने लगे हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाने वाले सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी दीपक कुमार को मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका से हटाकर बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया गया है।
दीपक कुमार लंबे समय तक नीतीश कुमार के साथ प्रशासनिक समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे। फरवरी 2021 में मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्हें अगले ही दिन मुख्यमंत्री कार्यालय में पुनर्नियुक्त किया गया था। अब सम्राट चौधरी सरकार में उनकी भूमिका बदले जाने को प्रशासनिक व्यवस्था में चल रहे पुनर्संयोजन के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
बदलाव महज एक अधिकारी का नहीं?
राजनीतिक विश्लेषण के नजरिये से देखें तो इस फैसले का महत्व केवल एक अधिकारी के तबादले तक सीमित नहीं है। यह इस बात का संकेत भी माना जा सकता है कि नई सरकार मुख्यमंत्री कार्यालय और प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया में अपनी कार्यशैली के अनुरूप बदलाव कर रही है।
नीतीश कुमार के शासन का शुरुआती दौर विकास, सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना गया। वहीं उनके लंबे कार्यकाल के अंतिम चरण में सत्ता और प्रशासन के बीच दूरी, अधिकारियों पर अत्यधिक निर्भरता तथा राजनीतिक संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं से संवाद जैसे मुद्दों को लेकर आलोचनाएं भी होती रहीं। इन आलोचनाओं की अपनी राजनीतिक व्याख्याएं हैं और इन्हें तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए अलग-अलग स्रोतों और आंकड़ों की जरूरत होगी।
यही वह बिंदु है जहां सम्राट चौधरी की नई पारी की असली परीक्षा शुरू होती है। मुख्यमंत्री के रूप में उनके सामने केवल पुराने प्रशासनिक ढांचे में बदलाव करने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह साबित करने की भी चुनौती है कि नई व्यवस्था निर्णय लेने, जवाबदेही और जनता से संवाद के मामले में किस तरह अलग दिखाई देती है।
'सिस्टम बदलने' से आगे की चुनौती
सम्राट चौधरी ने हाल के दिनों में प्रशासनिक और राजनीतिक मोर्चे पर सक्रियता दिखाई है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लगातार दौरे और राहत कार्यों में तेजी के निर्देश इसका एक उदाहरण हैं। वहीं भाजपा संगठन के स्तर पर भी उन्होंने पार्टी की रणनीति और बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने से जुड़ी बैठकों में भाग लिया है।
इससे यह संकेत मिलता है कि नई सरकार प्रशासन और संगठन—दोनों स्तरों पर अपनी उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
लेकिन किसी सरकार की दिशा केवल अधिकारियों के फेरबदल से तय नहीं होती। असली कसौटी यह होगी कि प्रशासनिक बदलावों का असर कानून-व्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता पर कितना दिखाई देता है।
नीतीश के बाद सम्राट के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती
नीतीश कुमार का राजनीतिक प्रभाव बिहार की राजनीति में लंबे समय से रहा है। 30 सितंबर को भी जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने नीतीश के राजनीतिक रिकॉर्ड और उनके निर्णय लेने की स्वतंत्रता का बचाव किया। इससे स्पष्ट है कि नीतीश कुमार का राजनीतिक अध्याय समाप्त मान लेना अभी राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी।
इसलिए सम्राट चौधरी के सामने चुनौती केवल 'नीतीश मॉडल' से दूरी बनाने की नहीं, बल्कि अपना अलग प्रशासनिक और राजनीतिक मॉडल स्थापित करने की है।
अगर प्रशासनिक बदलाव केवल चेहरों तक सीमित रहे तो उसका प्रभाव सीमित होगा। लेकिन यदि इन बदलावों के साथ जवाबदेही, पारदर्शिता, कार्यकर्ताओं और जनता से संवाद तथा नतीजा आधारित प्रशासन की नई संस्कृति विकसित होती है, तो इसे बिहार की सत्ता में एक नए चरण की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है।
यही कारण है कि दीपक कुमार को मुख्यमंत्री कार्यालय से हटाए जाने का फैसला प्रतीकात्मक महत्व रखता है। यह नीतीश कुमार के लंबे प्रशासनिक दौर की एक कड़ी के कमजोर होने का संकेत जरूर है, लेकिन सम्राट चौधरी के लिए असली सवाल अब यह है कि वे इस बदलाव को किस दिशा में ले जाते हैं।
डिस्क्लेमर: इमेज में दीपक कुमार की तस्वीर ठीक नहीं है


