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निष्कासन से बढ़ी अनंत सिंह की मुश्किलें, विधायकी पर भी सवाल

नीतीश के साथ रहने का संदेश या आगे की बड़ी कार्रवाई की भूमिका? 2015 के घटनाक्रम से हो रही तुलना, सरकार की अगली चाल पर टिकी नजरें

Prashant Kumar
Prashant Kumar
25 October 2026, 1:59 pm• 5 min read

प्रशांत कुमार क्राइम और खोजी पत्रकार है जो पिछले 15 सालों से क्राइम और अन्य मुद्दों पर लिखते है।

निष्कासन से बढ़ी अनंत सिंह की मुश्किलें, विधायकी पर भी सवाल

पटना: जदयू से छह वर्षों के लिए निष्कासित अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को लेकर बिहार की राजनीति में नए सिरे से चर्चाएं तेज हो गई हैं। पार्टी की इस कार्रवाई ने न केवल अनंत सिंह के अगले राजनीतिक कदम को लेकर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उनकी विधायकी के भविष्य पर भी अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह निष्कासन महज राजनीतिक संदेश देने की कवायद है या आने वाले दिनों में अनंत सिंह के खिलाफ किसी बड़ी कार्रवाई की भूमिका तैयार हो रही है?

अनंत सिंह और जदयू के रिश्तों को समझने के लिए पिछले राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है। नीलम देवी ने विधायक रहते हुए राजद का साथ छोड़कर जदयू का दामन थामा था। उस दौर में बदले राजनीतिक समीकरणों ने अनंत सिंह की राह आसान करने में भूमिका निभाई। जेल से बाहर आने, कानूनी मामलों में राहत मिलने और फिर विधायक बनने तक के उनके सफर को भी उस समय के राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़कर देखा जाता रहा। तब दोनों पक्षों के अपने-अपने राजनीतिक हित थे और बदले समीकरणों में एक-दूसरे की जरूरत भी।

हालांकि, अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। जदयू की कार्रवाई के बाद अनंत सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने राजनीतिक प्रभाव और भविष्य की दिशा तय करने की है। निष्कासन के बावजूद उनका नीतीश कुमार को अपना नेता बताना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वे फिलहाल मुख्यमंत्री से अपने रिश्तों को पूरी तरह खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं।

2015 के घटनाक्रम से हो रही तुलना

अनंत सिंह पर जदयू की कार्रवाई के बाद राजनीतिक विश्लेषक 2015 के घटनाक्रम को भी याद कर रहे हैं। बाढ़ के चर्चित पुटूस हत्याकांड के बाद अनंत सिंह और तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान के बीच टकराव की स्थिति बनी थी। उस समय जदयू और राजद गठबंधन की सरकार थी। नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक खेमों की एकजुटता के बीच अनंत सिंह को भी सत्ता की ताकत का एहसास हुआ था। बाद के घटनाक्रम में उनका जदयू से जुड़ना भी चर्चा का विषय बना।

इस प्रकरण को अब एक बार फिर इस नजरिये से देखा जा रहा है कि बिहार की राजनीति में व्यक्तिगत रसूख कितना भी बड़ा क्यों न हो, सत्ता और सरकारी तंत्र से टकराव की कीमत चुकानी पड़ सकती है। हालांकि, 2015 और मौजूदा परिस्थितियों में अंतर भी है। इसलिए पुराने घटनाक्रम को भविष्य की कार्रवाई का निश्चित संकेत मानना जल्दबाजी होगी।

क्या सिर्फ राजनीतिक संदेश देना चाहती है सरकार?

राजनीतिक गलियारों में एक धड़ा मानता है कि सरकार फिलहाल अनंत सिंह के खिलाफ किसी ताबड़तोड़ कार्रवाई से बच सकती है। इस मत के अनुसार, निष्कासन अपने आप में एक सख्त राजनीतिक संदेश है। इससे अनंत सिंह के राजनीतिक अहंकार और स्वतंत्र रूप से दबाव बनाने की क्षमता को सीमित करने की कोशिश की गई है। इसके बावजूद उनका नीतीश कुमार के प्रति समर्थन जताना बताता है कि वे अपने विकल्प पूरी तरह बंद नहीं करना चाहते।

तेजस्वी यादव की ओर से अनंत सिंह को राजनीतिक प्रस्ताव दिए जाने की चर्चाएं भी हैं, लेकिन इसकी कोई प्रमाणित पुष्टि सामने नहीं आई है। अनंत सिंह के लिए राजद में वापसी या उससे नजदीकी बढ़ाना भी आसान फैसला नहीं होगा। उन्हें अपने पुराने राजनीतिक समीकरणों, समर्थकों और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर ही कोई कदम उठाना होगा।

अगला कदम उठाने से पहले हो सकती है सख्ती?

दूसरी ओर, राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि अनंत सिंह के अगले कदम से पहले उनके खिलाफ बड़ी कार्रवाई भी हो सकती है। इस नजरिये के अनुसार, सरकार यह संदेश देना चाहेगी कि जदयू से निष्कासित या बागी रुख अपनाने वाले नेताओं के लिए राजनीतिक दबाव बनाने की गुंजाइश सीमित है। अनंत सिंह के साथ सख्त रुख अपनाने से उनके समर्थन में आवाज उठा रहे अन्य नेताओं को भी संदेश मिल सकता है।

इसी बीच अनंत सिंह की विधायकी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, पार्टी से निष्कासन और विधानसभा की सदस्यता समाप्त होना दो अलग-अलग विषय हैं। उनकी सदस्यता पर वास्तविक खतरा है या नहीं, यह संबंधित कानूनी प्रावधानों, किसी न्यायिक फैसले और विधानसभा की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। केवल पार्टी से निष्कासन को सदस्यता समाप्त होने का आधार नहीं माना जा सकता।

अब सबकी नजर सरकार की अगली चाल पर

फिलहाल अनंत सिंह प्रकरण में राजनीतिक कयासों का दौर जारी है। एक तरफ उनके नीतीश कुमार के प्रति समर्थन को संभावित सुलह के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, तो दूसरी तरफ इसे राजनीतिक दबाव के बीच संतुलन साधने की कोशिश माना जा रहा है। आने वाले दिनों में सरकार और जदयू का रुख ही तय करेगा कि यह विवाद यहीं थमता है या बिहार की राजनीति में एक नए टकराव की शुरुआत होती है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एनडीए नेताओं का वह पुराना राजनीतिक संदेश भी फिर सुनाई दे सकता है— न हमारी सरकार किसी को फंसाती है और न किसी को बचाती है। लेकिन इस संदेश की राजनीतिक व्याख्या क्या होगी और अनंत सिंह के मामले में इसका व्यावहारिक असर कितना दिखेगा, इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है।