Wednesday, 21 October 2026 · 8:45 pm IST
GroundWire

BSP उदय से पतन तक! बसपा क्यों नहीं बचा पाई अपना राजनीतिक जनाधार?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा जैसी पार्टी ने सबसे तेजी से सत्ता हासिल की उसका पतन भी उतनी ही तेजी से हुआ।

Shivam Sharma
Shivam Sharma
25 September 2026, 3:13 pm• 4 min read

शिवम शर्मा राष्ट्रीय राजनीति व क्राइम पर गहरी समझ रखने वाले पत्रकार व विश्लेषक है।

BSP उदय से पतन तक! बसपा क्यों नहीं बचा पाई अपना राजनीतिक जनाधार?

यह केवल बसपा की कहानी नहीं है। ये कहानी है उस सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन की, जिसने दलित समाज को न केवल उत्तर भारत बल्कि पूरे देश की राजनीति में अपनी अलग पहचान दिलाई। एक समय था जब बसपा ने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनाई। 2007 में पार्टी ने अकेले पूर्ण बहुमत हासिल किया। लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जहां बसपा केवल 1 सीट पर जीत पाई, वहीं 2024 लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली और वोट शेयर भी लगभग 9.39 प्रतिशत रह गया। ऐसे में विधानसभा का चुनाव नजदीक है, ये चुनाव बसपा के लिए उसके राजनीतिक भविष्य की परीक्षा भी है।

कांशीराम से मायावती तक: बहुजन राजनीति का उदय

जिसको आज हम बसपा के नाम से जानते है। कांशीराम ने बसपा की स्थापना से पहले बहुजनों और पिछड़े वर्ग के कर्मचारियों को संगठित करने के लिए बामसेफ और बाद में DS-4 नाम से संगठन बनाकर लामबंद किया। उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, हरियाणा समेत पूरे उत्तर भारत के दलितों को साथ लाकर 1984 में बसपा की स्थापना की।

1977 में मायावती दिल्ली में रहकर सिविल सर्विस की तैयारी कर रही थी। एक कार्यक्रम के दौरान मायावती कांशीराम के संपर्क में आती और मिशन से जुड़ जाती है। धीरे-धीरे वे कांशीराम की सबसे बड़ी सहयोगी बन गई।

1995 में मायावती ने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इसके बाद 1997, 2002, और 2007 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनती है।

2007 चुनाव: सोशल इंजीनियरिंग

2007 विधानसभा चुनाव में बसपा अकेले दम पर 403 में से 206 सीट जीती और लगभग 30.43 प्रतिशत वोट मिला। ये बसपा की उत्तर प्रदेश में अब तक की सबसे बड़ी जीत थी।

उस समय राजनीतिक केवल दलित ही नहीं बल्कि ब्राह्मण और ठाकुर जातियों ने भी बसपा को भरपूर वोट दिया। इसी चुनाव को सामाजिक समूहों को जोड़ने की राजनीति यानि "सोशल इंजीनियरिंग" के रूप में देखा गया।

ये वह समय था तब मायावती देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय दलित नेता के रूप में स्थापित हुई।

2012 के बाद बसपा का घटता जनाधार

पिछले विधानसभा चुनाव में जो बसपा अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने में कामयाब हुई।

वही 2012 में केवल 80 सीटों पर सिमट कर रह गई। समाजवादी पार्टी 224 सीटों के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही।

2017 के विधानसभा चुनाव में ये सीटें घटकर महज 19 रह गई हालांकि वोट प्रतिशत लगभग 22.23 प्रतिशत था। वोट शेयर बताता है कि बसपा का राजनीतिक प्रभाव केवल सीटों से नहीं समझा जा सकता। 2017 में पार्टी के पास बड़ा वोट आधार था लेकिन वो सीटों के अनुपात में परिवर्तित नहीं हो सका।

वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में गिरावट और अधिक स्पष्ट हो गई। बसपा केवल एक सीट जीत सकी और वोट शेयर केवल 12.88 प्रतिशत रहा।

इसके बाद 2024 लोकसभा चुनाव बसपा अकेले अपने दम पर 79 सीटों पर लड़ी और एक भी सीट नहीं जीत पाई। वोट शेयर भी लगभग 9.39 प्रतिशत तक गिर गया।

क्यों कमजोर हुआ बसपा का जनाधार?

बसपा के कमजोर होना का कोई एक कारण नहीं है। राजनीतिक विशेषज्ञ इसके पीछे कई राजनीतिक और संगठनात्मक कारणों की चर्चा करते है।

पहला कारण दलित वोटों का बिखराव है। बसपा लंबे समय तक दलित मतदाताओं की प्रमुख राजनीतिक पसंद रही। लेकिन पिछले चुनावों में अन्य राजनीतिक पार्टियों ने भी दलित मतदाताओं तक पहुँच बढ़ाई है।

दूसरा कारण युवा नेतृत्व की कमी। भारत एक युवा आबादी वाला देश है। वही बसपा की राजनीति लंबे समय से मायावती के इर्द गिर्द केंद्रीत रही। इससे दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व व्यापक स्तर तक नहीं पहुंच पाया।

तीसरा कारण अपने नेताओं की पार्टी से बगावत और संगठनात्मक कमजोरी। पार्टी के बड़े बड़े नेताओं ने मायावती का साथ छोड़ अन्य रणनीतिक पार्टियों का दामन थाम लिया। पार्टी छोड़ने से नेता अपने साथ बसपा का संगठन अब बूथ लेवल पर कमजोर हो गया। यही कारण है कि बसपा आज उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतक जनाधार खो बैठी है।