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राजनीति: ब्राह्मण से मोहब्बत, ब्राह्मण से लड़ाई!

उत्तर प्रदेश विस चुनाव 2027 में सभी दलों की ब्राह्मण वोटबैंक पर नज़र

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Aditya Mishra
12 September 2026, 10:43 pm 6 min read
राजनीति: ब्राह्मण से मोहब्बत, ब्राह्मण से लड़ाई!

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 के मद्देनज़र विभिन्न राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने-अपने पाले में करने की जुगत लगा रहे हैं। कुछ दल विशेष तौर पर ब्राह्मण मतदाताओं पर निगाह जमाते दिख रहे हैं। ब्राह्मण वोट बटोरने के चक्कर में जहां एक ओर उत्तर प्रदेश की प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव अपने चुनावी फॉर्मूला 'पीडीए' जिसे वे "पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक" की संज्ञा देते आए हैं, अब ब्राह्मण वोटरों के रिझाने के लिए 'पीडीए' में से 'पीडी' को वह पंडित कहकर संबोधित कर रहे हैं। इसी बीच पीडी को पंडित की संज्ञा देने वाले अखिलेश का ही यह बयान भी वायरल होता रहता है जिसमें वह विश्वविद्यालयों में ऊंची जाति के लोगों द्वारा कब्जे की बात कहते नजर आते हैं, उन्होंने यहां तक कह दिया कि "जितने भी ऊंची जाति के लोग हैं उन्होंने कभी भी पिछड़े, दलित, एससी-एसटी वर्ग के बच्चों को आगे नहीं आने दिया।"

 

'तुम्हीं से मोहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई'-

कहना गलत नहीं होगा कि "तुम्हीं से मोहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई" जो कि एक फिल्मी गाना है, राजनीति में इन दिनों "ब्राह्मणों से मोहब्बत, ब्राह्मणों से लड़ाई" में बदल चुका है। विश्वविद्यालयों पर ऊंची जाति के कब्जे वाले बयान में एक तरफ अखिलेश सभी ऊंची जाति के लोगों को पिछड़े, दलित, एससी-एसटी वर्ग के बच्चों का विरोधी बताया था, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता विपक्ष की कुर्सी पर माता प्रसाद पाण्डेय को बैठा रखा है। जाहिर सी बात है कि वह ऊंची जाति के लोगों पर भेदभाव का आरोप लगाकर पिछड़ा व दलित वर्ग का वोट हासिल करना चाहते हैं, दूसरी तरफ माता प्रसाद पाण्डेय को आगे करके सवर्ण समाज का वोट भी बांधे रखना चाहते हैं। लेकिन सोशल मीडिया के जमाने में अखिलेश यादव की राह इतनी आसान नहीं है। उनके पुराने बयान बार-बार उनकी नियत पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। सपा प्रमुख अखिलेश का एक और वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वह एक पत्रकार से उसका नाम पूछते हुए कहते हैं- "मिश्रा जी! अरे मिश्रा जी, कुछ तो शर्म करो, कुछ शर्म करो यार।"

सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव के पुराने बयान ही नहीं उनके पुराने साथी सुहेलदेव समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ओमप्रकाश राजभर भी उनकी राह मुश्किल करने में जुटे हैं और आए दिन अपने विशेष अंदाज में अखिलेश के खिलाफ बयान देते रहते हैं। ओमप्रकाश राजभर अखिलेश को निशाना बनाते हुए 'पीडीए' को कभी 'परिवार डेवलपमेंट पार्टी' तो कभी 'पीट देगा अहिर' कहकर सपा के चुनावी फॉर्मूले को फेल करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।

 

बसपा की पैनी नजर, मायावती हुईं सक्रिय-

वहीं बहुजन समाज पार्टी की नज़र भी लम्बे समय से ब्राह्णण वोटों पर है। बसपा के इरादे इस साल के शुरु में जाहिर हो गये थे जब सुप्रीमो मायावती ने अपने जन्मदिन के अवसर पर ब्राह्मणों को पार्टी के साथ जोड़ने का प्रयास किया था। उन्होंने ब्राह्मण विधायकों की बैठक का जिक्र करते हुए कहा था कि ब्राह्णण विधायकों की स्थिति अच्छी नहीं है। बसपा ने पहले भी ब्राह्णणों को अपनी सरकार में सम्मान दिया था। सरकार बनने के बाद भी सम्मान दिया जाएगा। ब्राह्मण आज उपेक्षित है। उन्होंने कहा था कि-कुछ यही हाल सपा और कांग्रेस में है। गौर करने वाली बात है कि यह वही बसपा है जिसकी तरफ से पिछड़ा व दलित वोट बटोरने के लिए कभी 'तिलक-तराजू और तलवार...' का नारा लगता था, और बाद में सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला अपनाकर 2007 के चुनावों में 'हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्म, विष्णु, महेश' हैं का नारा दिया गया और ब्राह्मण वोटरों की मदद से सरकार बनाई गयी थी। बसपा सुप्रीमो फिर से ब्राह्मण वोटरों का समर्थन हासिल करने के लिए उनके सम्मान की बात करती दिख रही है।

 

आंदोलनों की चुनौतियों के बीच भाजपा को मोदी-योगी के फैसलों और संगठन का सहारा-

भाजपा के लिए लिए इन दिनों कई चुनौतियां सामने हैं। सीजेपी द्वारा नीट पेपर लीक मामले में जंतर-मंतर पर चला धरना खत्म तो हुआ लेकिन विभिन्न राज्यों में स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी वे समय-समय पर सवाल उठाते रहते हैं। दूसरी तरफ यूजीसी एक्ट और आरक्षण के मुद्दे पर सोशल मीडिया से लेकर सड़कों पर सरकार के खिलाफ आंदोलन हो रहा है। इन चुनौतियों के बीच समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दल जिस तरह से ब्राह्मण कार्ड खेल रहे हैं उससे भाजपा को ब्राह्मण वोटबैंक खिसकने की आशंका सता रही है। इस आशंका को दूर करने के प्रयास के तहत यूपी के विभिन्न जिलों में हो रहे भाजपा के सांगठनिक बदलाव में ब्राह्मणों को मिल रहे महत्व को भी ब्राह्मण वोटबैंक खिसकने की आशंका को दूर करने के प्रयास की तरह देखा जा रहा है। गोरखपुर के अखबारों में इन दिनों भाजपा की क्षेत्रीय टीम की घोषणा में ब्राह्मणों को मिला महत्व सुर्खियों में है। 39 सदस्यीय टीम में 10 ब्राह्मण चेहरों को शामिल करना कहीं ना कहीं ब्राह्मण वोटरों के महत्व की ओर इशारा करता है।

योगी आदित्यनाथ भाजपा के लोकप्रिय चेहरा हैं। यूपी और देश के विभिन्न राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान उनकी भारी मांग रहती है। गोरखपुर में तो कहना ही क्या! यहां उन्हें समाज के हर वर्ग का समर्थन मिलता है। उनके चुनावी मैदान में उतरने पर जाति-धर्म का मुद्दा पीछे छूट जाता है। योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में जिस तरह से उपेंद्र दत्त शुक्ल की पराजय हुई, प्रवीण निषाद सपा के टिकट पर सांसद बने उसके बाद इस सीट पर लोगों का ध्यान फिर से जाति की ओर गया। भाजपा की तरफ से गोरखपुर में राजनीतिक समीकरण बैठाते हुए रवि किशन शुक्ला को लोकसभा का टिकट दिया गया। इसी क्रम में गोरखपुर से कभी विधायक रहे शिवप्रताप शुक्ला को पहले राज्यसभा भेजा गया, केंद्र सरकार में मंत्री बनाया गया, फिर हिमाचल प्रदेश उसके बाद तेलंगाना का राज्यपाल बनाया गया। उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा के लिए योगी आदित्यनाथ के चुनावी क्षेत्र गोरखपुर में ब्राह्मण नेताओं का कितना महत्व है। ब्राह्मणों से संबंधित छिटपुट घटनाओं को लेकर विरोधी जिस तरह से योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगाते है। कम से कम गोरखपुर क्षेत्र में भाजपा की तरफ से ब्राह्मण नेताओं को महत्व मिलने से विपक्षियों के आरोप बेअसर साबित हो जाते हैं। यह भी स्पष्ट है कि चुनाव में केंद्र सरकार की जनहित की योजनाएं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की प्रचार-प्रसार, और नये संगठन का जोश भाजपा को ऊर्जा देगा। 2029 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर भाजपा कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखेगी।

चुनावी मौसम में योगी आदित्यनाथ के बुल्डोजर बाबा वाली छवि, अपराधियों को मिट्टी में मिलाने का संकल्प, 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाओं को मुफ्त बस सेवा, आउटसोर्स कर्मचारियों के हित में किये जा रहे ताबड़तोड़ फैसलों के बीच भाजपा की तरफ से अखिलेश यादव के खिलाफ एआई से बनाया गया विडियो, सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा अपने कार्यालय में योगी आदित्यनाथ के खिलाफ उसी प्रकार का जवाबी विडियो चलाना, सपा और बसपा के ब्राह्मण प्रेम, ओमप्रकाश राजभर का सपा प्रमुख पर किए जा रहे राजनीतिक कटाक्ष और भाजपा के सांगठनिक बदलाव इन दिनों चर्चा के विषय बने हैं। सत्ता की इस लड़ाई में ब्राह्मणों से 'कभी मोहब्बत तो कभी लड़ाई' जैसी स्थिति बनी हुई है। देखना है कि 2027 के चुनाव में 'मोहब्बत और लड़ाई' का क्या अंजाम सामने आता है!