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सुप्रीम कोर्ट ने एमडीआर पर रोक लगाने से किया इन्कार

सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई अधिवक्ता अंजन दत्ता द्वारा दायर जनहित याचिका पर हो रही थी

Anshu Kumari
Anshu Kumari
29 September 2026, 12:16 pm• 2 min read

भारतीय जनसंचार संस्थान IIMC द्वारा प्रशिक्षित अंशु कुमारी, सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों पर लिखने वाली पत्रकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने एमडीआर पर रोक लगाने से किया इन्कार

सुप्रीम कोर्ट ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस -यूपीआई के जरिए व्यक्ति से व्यापारी को 2000 से अधिक के भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू किए जाने के फैसले पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया है। केंद्र सरकार ने करीब छह वर्षों से निःशुल्क चल रही यूपीआई भुगतान व्यवस्था पर 15 अक्टूबर से यूपीआई से व्यापारियों को किए जाने वाले 2,000 रुपये से अधिक के भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू करने का प्रावधान किया है। वहीं, व्यक्ति-से-व्यापारी लेनदेन और छोटे भुगतानों को किसी भी शुल्क से बाहर रखने का प्रावधान है। अब इस मामले में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक और राष्ट्रीय भुगतान निगम को नोटिस जारी किया और चार सप्ताह के अंदर जवाब मांगा है।

क्या है मामला

सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई अधिवक्ता अंजन दत्ता द्वारा दायर जनहित याचिका पर हो रही थी। याचिका में 2,000 से अधिक के निर्धारित यूपीआई व्यक्ति-से-व्यापारी लेनदेन पर एमडीआर लगाने के केंद्र के फैसले को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट से एमडीआर पर रोक लगाने की मांग की थी। याचिका में अदालत में इस व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर आपत्ति जताई गई थी।
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने पीठ को बताया कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल करने वाले लगभग 96 प्रतिशत लोग शुल्क दायरे से बाहर रहेंगे। सरकार के अनुसार, प्रस्तावित शुल्क मुख्य रूप से निर्धारित सीमा से अधिक के कुछ व्यापारी लेनदेन पर लागू होगा।

यूपीआई भारत में डिजिटल भुगतान का एक प्रमुख माध्यम बन चुका है। लंबे समय से उपभोक्ताओं के लिए यूपीआई भुगतान को निःशुल्क इस्तेमाल करने की व्यवस्था रही है। ऐसे में मर्चेंट डिस्काउंट रेट से जुड़े नए प्रावधान का असर व्यापारियों, भुगतान सेवा प्रदाताओं और डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर पड़ सकता है। अब इस मामले में केंद्र सरकार, रिज़र्व बैंक और राष्ट्रीय भुगतान निगम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए जाने वाले जवाब के बाद आगे की तस्वीर साफ होगी।