मीडिया का काम खबरों के जरिए सवाल उठाना है, न कि बिना पर्याप्त आधार किसी व्यक्ति का नाम किसी गंभीर मामले से जोड़कर उसकी प्रतिष्ठा को कटघरे में खड़ा करना। लोकगायिका नेहा सिंह राठौर और एबीपी न्यूज से जुड़े विवाद ने एक बार फिर पत्रकारिता की विश्वसनीयता, संपादकीय जवाबदेही और टीआरपी की होड़ पर सवाल खड़े किए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस हॉस्टल में कथित तौर पर सेक्स रैकेट संचालित होने की बात कही गई, उससे नेहा सिंह राठौर का नाम जोड़ने का आधार क्या था? क्या वह उस हॉस्टल की मालकिन हैं या कभी उसकी मालकिन रही हैं? यदि नहीं, तो रिपोर्ट में उनका नाम किस तथ्य के आधार पर शामिल किया गया? किसी व्यक्ति का नाम किसी गंभीर आपराधिक गतिविधि से जोड़ने से पहले तथ्यों की पुष्टि करना पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारी है। इस मामले में रिपोर्टर की भूमिका के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि प्रसारण से पहले संपादकीय डेस्क पर बैठे जिम्मेदार लोगों ने खबर की जांच किस स्तर पर की।
रिपोर्टर की चूक और संपादकीय डेस्क की जवाबदेही को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। खबर तैयार करने से लेकर उसके प्रसारण तक कई स्तरों पर जांच और संपादन की व्यवस्था होती है। यदि इस प्रक्रिया के बावजूद तथ्यात्मक त्रुटि रह जाती है, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। हालांकि, अंतिम निष्कर्ष संबंधित रिपोर्ट, उपलब्ध साक्ष्यों और चैनल के पक्ष की पड़ताल के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
इस पूरे प्रकरण को मीडिया में जानकारों की उपेक्षा के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा सकता है। जब अनुभव, विषय की समझ और तथ्य-जांच की क्षमता के बजाय त्वरित प्रसारण तथा लोकप्रियता को प्राथमिकता मिलने लगती है, तो पत्रकारिता की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है।
विडंबना यह है कि नेहा सिंह राठौर स्वयं अपने गीतों और टिप्पणियों के जरिए लोगों के चाल-चरित्र तथा सत्ता के कामकाज पर सवाल उठाती रही हैं। उनकी शैली और विचारधारा से असहमति हो सकती है, लेकिन इससे उनके साथ कथित अनुचित व्यवहार को सही नहीं ठहराया जा सकता। अब उनका बड़ी महिला नेताओं को टैग कर एबीपी न्यूज के खिलाफ आवाज उठाने की अपील करना भी इसी विवाद का हिस्सा है।
हाल में एक समाचार पत्र के निर्णायक की तुकबंदी के चक्कर में बच्चों को गंगा का भोग बना देने वाली टिप्पणी ने भी शब्दों के चयन और संवेदनशीलता पर सवाल उठाए थे। ऐसे उदाहरण दोयम दर्जे की पत्रकारिता के उभार की आशंका को मजबूत करते हैं।
पत्रकारिता में असहमति, आलोचना और सवालों की पूरी गुंजाइश है, लेकिन टीआरपी और सस्ती लोकप्रियता के लिए तथ्यों तथा संवेदनाओं से समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता। मीडिया की विश्वसनीयता आरोपों की तीव्रता से नहीं, बल्कि तथ्यों की मजबूती और अपनी गलतियों के प्रति जवाबदेही से तय होती है।


