Tuesday, 15 September 2026 · 9:26 pm IST
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ब्रिक्स 2026: क्या होगा पश्चिम के समक्ष इस गुटबाज़ी से?

हाल ही में सम्पन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन का समापन नई दिल्ली घोषणा के निर्विरोध पारित होने से हो गया, चलिए इसके मायने समझते हैं...

Yash Vikas
Yash Vikas
15 September 2026, 8:15 pm 5 min read

यश विकास अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों, समाज और राजनीति तथा प्रशासन से जुड़े विषयों पर लिखने वाले पत्रकार हैं ।

ब्रिक्स 2026: क्या होगा पश्चिम के समक्ष इस गुटबाज़ी से?

रविवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का ‘नई दिल्ली घोषणा-2026’ के अंगीकरण के साथ समापन हो गया। इस वर्ष के शिखर सम्मेलन की अध्ययक्षता भारत कर रहा था जिसमें BRICS (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के 11 सदस्य देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने हिस्सा लिया जिसमें मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात शामिल थे। चौथी बार ब्रिक्स सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे भारत द्वारा “सुदृढ़शीलता, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण” सम्मेलन का विषय रखा गया। दो दशक पूर्व गठित हुई इस वैश्विक साझेदारी का लक्ष्य ‘ग्लोबल साउथ’ की उभरती अर्थव्यवस्थाओं और उनकी बढ़ती आकांक्षाओं के लिए मंच बनना है ना की ‘पश्चिम विरोधी’ धड़ा तैयार करना।  

सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र, IMF, विश्व बैंक और WTO जैसी संस्थाओं में सुधार पर जोर दिया गया, ताकि ये संस्थाएं वर्तमान वैश्विक आर्थिक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित कर सकें। लेकिन पश्चिमी देशों द्वारा कथित नियंत्रण के मद्देनजर ब्रिक्स इन्ही संस्थाओं के तर्ज पर न्यू डेवेलोपमेंट बैंक (एन डी बी) और कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट (सीआरए) जैसी संथाओं का निर्माण पिछले एक दशक से कर रहा है जिससे इनपर निर्भरता घटाई जा सके । कॉन्टिंजेंट रिज़र्व अरेंजमेंट (CRA) एक ऐसा फ़्रेमवर्क है जो भुगतान संतुलन (balance of payments) पर आने वाले वास्तविक या संभावित अल्पकालिक दबावों के समय लिक्विडिटी और एहतियाती साधनों के ज़रिए सहायता प्रदान करता है। वहीं न्यू डेवेलोपमेंट बैंक का उद्देश्य लोन, गारंटी, इक्विटी में हिस्सेदारी और दूसरे फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स के ज़रिए पब्लिक या प्राइवेट प्रोजेक्ट्स को सपोर्ट करना और "इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन और दूसरे फाइनेंशियल संस्थानों के साथ सहयोग करना, और बैंक द्वारा सहायता किए जाने वाले प्रोजेक्ट्स के लिए टेक्निकल मदद देना है। प्रत्यक्ष रूप से संयुक्त राज्य अमरीका का नाम लिए बगैर, सम्मेलन में एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं की आलोचना की गई जो व्यापार को विकृत करते हैं और WTO के नियमों का उल्लंघन करते हैं। साथ ही पश्चिमी यूरोपीय देशों द्वारा लाए गए कार्बन बॉर्डर टैक्स / CBAM  को छिपे हुए संरक्षणवाद के रूप में देखते हुए इसकी भी आलोचना की गई। लेकिन डॉलर के समक्ष किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा का प्रस्ताव नहीं रखा गया। ब्रिक्स देशों के लिए "डॉलर-मुक्ति" की घोषणा करना और उसे यथार्थ में बदलने में कितनी मुश्किलें आती हैं और ये कितना कामयाब होता है ये समय बताएगा।

 

सम्मेलन में चीन और रूस ने भारत तथा ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका देने, जिसमें सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया। घोषणा में मध्य पूर्व/पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। अमेरिका, इजरायल, ईरान या खाड़ी देशों का सीधे नाम नहीं लिया गया लेकिन IAEA के सुरक्षा उपायों के अंतर्गत आने वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर हमलों की निंदा की गई। इसे ईरानी परमाणु प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों की अप्रत्यक्ष आलोचना के रूप में देखा गया। 2026 की घोषणा में ‘यूक्रेन’ का नाम सीधे नहीं लिया गया। विवादों को संवाद, परामर्श और कूटनीति के माध्यम से हल करने की सामान्य अपील की गई।  संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा अधिकृत न किए गए एकतरफा प्रतिबंधों  की कड़ी आलोचना की गई। इसे रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों की ओर संकेत माना गया। घोषणा में फिलिस्तीनियों के  जबरन विस्थापन का कड़ा विरोध किया गया जिसके तहत गाजा में इजरायली युद्ध समाप्त करने तथा मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करने की मांग की गई। संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन की पूर्ण सदस्यता, 1967 की सीमाओं के आधार पर दो-राष्ट्र समाधान  तथा पूर्वी यरुशलम को फिलिस्तीन की राजधानी बनाने की स्थिति का समर्थन किया गया। ब्रिक्स समूह की सबसे बड़ी चुनौती अपने सदस्य देशों के हितों को साझा हितों में बदलना होगा क्यूंकी कई सदस्य देशों के बीच यह सहयोग अप्राकृतिक प्रतीत होता है जैसे भारत-चीन के बीच 1962 के युद्ध से ही सीमा विवाद है जिसके चलते कई बार दोनों देश आमने-सामने आ चुके हैं, पाँच वर्ष पूर्व हुई गलवान घाटी की सैन्य झड़प इसका ताज़ा उदाहरण है। रूस भारत का अहम रणनैतिक साझेदार और विश्वसनीय मित्र देश है लेकिन प्रतिबंधों के चलते रूस चीनी सप्लाइ चेन पर निर्भर है। ईरान और यूएई के कूटनैतिक-संबंधों में पहले से ही कई दरारें है। ऐसे में ब्रिक्स समूह द्वारा ग्लोबल साउथ को आवाज देने के दावे और सदस्य देशों के हितों को ब्रिक्स के साझा हित में परिवर्तित करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है ।

 

नई दिल्ली घोषणा 2026 में ब्रिक्स निरंतरता और कार्यान्वयन तंत्र एक महत्वपूर्ण प्रोटोटाइप पहल है जिसका उद्देश्य ब्रिक्स में प्रमुखों और निर्णयों के सुझाव और उनकी प्रगति पर नजर रखना है ।

इसके लिए ट्रोइका तंत्र का उपयोग किया जाएगा:

पिछली अध्यक्षता + वर्तमान अध्यक्षता + अगली अध्यक्षता

इससे BRICS की पहलों में निरंतरता बनाए रखने का प्रयास होगा, और इन पहलों में तटस्थता बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा। कुल मिलाकर भारत ने इस समिट का इस्तेमाल अपनी रणनीतिक स्वांतन्त्रता दिखाते हुए बड़ी ताकतों की आपसी होड़ का अखाड़ा बने बिना सभी पक्षों के साथ जोड़ने के लिए किया । भारत “ग्लोबल साउथ' और स्थापित ताकतों के बीच एक सेतु के तौर पर उभर कर आ रहा है, और BRICS को खुले तौर पर पश्चिमी-विरोधी गुट में बदले बिना उसमें सुधार की वकालत कर रहा है। इस वर्ष का ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए एक कूटनैतिक खींच-तान की स्थिति से कहीं ज्यादा उसके वैश्विक महाशक्ति बनने की राह में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में समझा जाना चाहिए। अब ये देखने वाली बात होगी कि ब्रिक्स अपने सदस्य देशों की सामूहिक सौदेबाज़ी की ताकत को ठोस नीतियों में कैसे कार्यान्वित करता है तथा कौन-सा बाध्यकारी तंत्र किसी सदस्य देश को उन्हें लागू करने के लिए मजबूर करता है?