बिहार के रोहतास पुलिस की जांच व्यवस्था में गंभीर लापरवाही का सनसनीखेज मामला सामने आया है। जिस महिला की दहेज हत्या और शव गायब करने के आरोप में एक ही परिवार के आठ सदस्यों को जेल जाना पड़ा, वह 12 वर्ष बाद झारखंड में जीवित मिली है। आरोप है कि पुलिस ने बिना ठोस पहचान और सत्यापन के किसी अज्ञात शव को शकुंतला देवी उर्फ कांति देवी मान लिया और कागजों में उसे मृत घोषित कर दिया। इस कार्रवाई के चलते परिवार को वर्षों तक कानूनी लड़ाई, आर्थिक तबाही और सामाजिक कलंक झेलना पड़ा।
2014 में गायब हुई महिला, दर्ज हो गया हत्या का केस
मामला डेहरी मुफस्सिल थाना क्षेत्र के बालरती बिगहा से जुड़ा है। दिलीप महतो के पुत्र अरुण कुमार की शादी वर्ष 2003 में औरंगाबाद के पिरौटा निवासी हजारी वर्मा की पुत्री शकुंतला देवी उर्फ कांति देवी से हुई थी। वर्ष 2014 में शकुंतला अचानक ससुराल से लापता हो गई। इसके बाद मायके पक्ष की ओर से 20 अगस्त 2014 को डेहरी नगर थाने में दहेज हत्या का मामला दर्ज कराया गया।
परिवार का आरोप है कि पुलिस ने मामले की गहराई से जांच किए बिना एक अज्ञात शव का पोस्टमार्टम कराकर उसे शकुंतला का शव मान लिया। शव की पहचान की प्रक्रिया, डीएनए जांच और अन्य जरूरी सत्यापन को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आठ लोगों को जेल, बेचनी पड़ी जमीन और गाड़ियां
पुलिसिया कार्रवाई के बाद शकुंतला के पति अरुण कुमार, ससुर दिलीप महतो, सास भगवानों देवी, बबीता देवी, देवर भरत महतो, गोतनी सविता देवी, देवर गोबिंद महतो और गोतनी संजू देवी को जेल जाना पड़ा।
परिवार के मुताबिक, मुकदमे और जमानत की प्रक्रिया में उनकी आर्थिक स्थिति पूरी तरह चरमरा गई। कानूनी खर्च पूरा करने के लिए जमीन और गाड़ियां तक बेचनी पड़ीं। बाद में सासाराम न्यायालय से मामला समाप्त हो गया, लेकिन तब तक परिवार वर्षों की कानूनी लड़ाई और सामाजिक बदनामी का दंश झेल चुका था।
12 साल बाद झारखंड में मिली शकुंतला
मामले में नया मोड़ तब आया, जब ससुर दिलीप महतो को गुप्त सूचना मिली कि शकुंतला देवी झारखंड के कांडी थाना क्षेत्र के लभारी कला गांव में रह रही है। स्वजन वहां पहुंचे और महिला की पहचान शकुंतला के रूप में की।
इसके बाद एसपी के निर्देश पर डेहरी मुफस्सिल थाना की पुलिस झारखंड पहुंची और महिला को सकुशल बरामद कर रोहतास ले आई। पुलिस ने न्यायालय में उसका धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराया। इसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
अब जांच पर सबसे बड़ा सवाल
पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यदि महिला जीवित थी तो 2014 में बरामद अज्ञात शव को उसकी पहचान के बिना शकुंतला का शव कैसे मान लिया गया? क्या शव की पहचान के लिए पर्याप्त प्रक्रिया अपनाई गई थी? क्या डीएनए जांच अथवा अन्य वैज्ञानिक तरीकों से पहचान की कोशिश की गई थी? यदि नहीं, तो इतनी गंभीर कार्रवाई किस आधार पर की गई?
पीड़ित परिवार ने मामले की दोबारा गहन जांच कराने के साथ तत्कालीन जांच में लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों और गलत तरीके से मुकदमा दर्ज कराने के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है। मामला अब केवल एक परिवार के 12 वर्ष बर्बाद होने का नहीं, बल्कि पुलिस जांच में सत्यापन की प्रक्रिया और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।


