किसी की आह लेना आसान है, लेकिन उसके असर से बच पाना मुश्किल है। जिंदगी का यही सहज सत्य न्यूटन के तीसरे नियम की याद दिलाता है—हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। किसी के साथ हुआ अन्याय वक्त के साथ भुला दिया जाए, लेकिन पीड़ित परिवार की पीड़ा और उसकी बद्दुआओं का हिसाब कौन रखता है? मधुबनी में निगरानी की कार्रवाई के बाद चर्चा में आए डीएसपी सुजीत कुमार का मामला भी इसी सवाल को सामने लाता है। हालांकि, उनके खिलाफ लगे आरोपों और पुराने मामले से जुड़े तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
एक गिरफ्तारी, कई पुराने सवाल
वर्ष 2017-18 की बात है। तब सुजीत कुमार फतुहा थाने के थानाध्यक्ष थे। रेलवे अंडरपास के नीचे एक महिला का शव मिला था। शव दो-तीन दिनों तक पानी में रहने के कारण खराब हो चुका था। उसी सुबह पुनपुन इलाके के एक खेत से हाफ पैंट पहने युवक का शव भी मिला। उसकी जेब से खैनी का डिब्बा और दस रुपये का नोट बरामद हुआ था।
महिला के शव के पास मिले एक ज्वेलरी दुकान के खरीद बिल से उसकी पहचान की गई। इसके बाद पुलिस ने महिला के पति, ससुराल पक्ष के लोगों और गांव के एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया, जिसके पास पिकअप वैन थी। पुलिस की थ्योरी थी कि महिला का प्रेमी उससे मिलने ससुराल आया था। दोनों को पकड़ने के बाद उनकी हत्या कर दी गई और शव अलग-अलग जगहों पर फेंक दिए गए। महिला की पहचान छिपाने के लिए उसके चेहरे पर एसिड डालने की बात भी सामने आई थी।
पुलिस ने इस कहानी के आधार पर केस तैयार किया। तत्कालीन एसएसपी मनु महाराज ने गिरफ्तारियों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आधिकारिक जानकारी भी जारी की थी। लेकिन कहानी का एक सिरा तब तक अनसुलझा था—पुनपुन में मिले युवक की पहचान।
जब सामने आई दूसरी कहानी
उस समय एसएसपी कार्यालय के परिसर में खबरों की टोह में बैठा मैं इस मामले को करीब से देख रहा था। महिला के ससुर, जो जमानत पर बाहर थे, अपने दामाद के साथ निष्पक्ष जांच की गुहार लगाने पहुंचे थे। महिला का पति जेल में था। परिवार का कहना था कि पुलिस ने जिस कहानी के आधार पर उन्हें आरोपित बनाया, उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
परिवार की गुहार का कोई नतीजा नहीं निकल रहा था। मैंने भी इस मामले को लेकर सवाल उठाए, लेकिन परिवार को राहत नहीं मिली।
बाद में सामने आई जानकारी के अनुसार, महिला की हत्या के मामले में कथित प्रेमी संतु की गिरफ्तारी हुई। बताया गया कि वह जेवर बेचने की कोशिश में पकड़ा गया था। पुलिस को पता चला कि महिला के ननिहाल पक्ष के लोग दिल्ली में रहते थे और संतु भी उसी परिवार से जुड़ा था। आरोप था कि महिला जब जेवर और नकदी लेकर ससुराल से निकली, तो संतु ने उसके बैग में रखे सामान को देखा। इसके बाद उसने महिला की हत्या कर दी।
इस विवरण के अनुसार, महिला ने वापस जाने की इच्छा जताई थी। संतु उसे रेलवे अंडरपास के पास ले गया, जहां दुपट्टे से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। यानी जिस मामले में ससुराल पक्ष को हत्याकांड का आरोपित बनाया गया था, उसमें बाद में एक दूसरी कहानी सामने आई।
यहां सबसे बड़ा सवाल पुलिस की जांच पर था। यदि संतु की गिरफ्तारी के बाद घटनाक्रम की दूसरी तस्वीर सामने आ गई थी, तो पहले से आरोपित बनाए गए परिवार के साथ क्या हुआ? क्या जांच में हुई संभावित गलती सुधारी गई? क्या परिवार को समय पर न्याय मिला?
राहत के नाम पर 35 हजार रुपये का आरोप
परिवार की पीड़ा यहीं खत्म नहीं हुई। आरोप है कि मामले में राहत दिलाने के नाम पर तत्कालीन थानाध्यक्ष ने 35 हजार रुपये भी लिए। यदि यह आरोप सही है, तो यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि उस परिवार के भरोसे के साथ भी धोखा था, जो पहले ही अपने बेटे को जेल से बाहर निकालने और निष्पक्ष जांच की गुहार लगाने में परेशान था।
एक ओर परिवार के पैसे खर्च हो रहे थे, दूसरी ओर बेटे को जेल में देखकर बुजुर्ग माता-पिता की पीड़ा बढ़ रही थी। उनके लिए यह सिर्फ एक आपराधिक मुकदमा नहीं, बल्कि जिंदगी भर का मानसिक और आर्थिक संघर्ष बन गया था।
इस प्रकरण में पुलिस की शुरुआती थ्योरी, बाद में सामने आए कथित घटनाक्रम और वसूली के आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी है। उपलब्ध विवरण के आधार पर किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी को अंतिम रूप से तय नहीं किया जा सकता, लेकिन जांच की जवाबदेही और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने का सवाल अपनी जगह कायम है।
वर्दी, अधिकार और जवाबदेही
सुजीत कुमार के निजी जीवन को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं रही हैं। बताया जाता है कि उन्होंने अपनी पहली शादी खत्म करने के बाद 2009 बैच की एक महिला सब इंस्पेक्टर से विवाह किया था। हालांकि, निजी जीवन की परिस्थितियां किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोपों का प्रमाण नहीं होतीं। किसी अधिकारी के आचरण का मूल्यांकन उसके काम, उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर ही होना चाहिए।
मधुबनी में निगरानी की कार्रवाई के बाद सुजीत कुमार से जुड़ा यह पुराना प्रसंग फिर याद आता है। कार्रवाई में सामने आए तथ्यों और पुराने मामले के आरोपों को अलग-अलग जांचना जरूरी है। निगरानी की कार्रवाई अपने आप में किसी आरोप को अंतिम रूप से सिद्ध नहीं करती, लेकिन यह जरूर याद दिलाती है कि सरकारी पद पर बैठा व्यक्ति कानून और जवाबदेही से ऊपर नहीं है।
किसी की आह को अंधविश्वास मानकर खारिज किया जा सकता है, लेकिन अन्याय से उपजी पीड़ा को नहीं। न्यूटन का तीसरा नियम भौतिकी का सिद्धांत है, नैतिक न्याय की गारंटी नहीं। फिर भी समाज में एक बात हमेशा प्रासंगिक रहेगी—अधिकार का दुरुपयोग, गलत जांच और पीड़ित की मजबूरी का फायदा उठाना कभी सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। क्योंकि वर्दी की असली प्रतिष्ठा उसके रौब में नहीं, न्याय के प्रति उसकी जवाबदेही में होती है।


