जमुई में नाबालिग छात्र-छात्रा के साथ हुई घटना बेहद गंभीर और निंदनीय है। पुलिस ने वीडियो प्रसारित करने वाले 120 इंटरनेट यूजर्स को चिह्नित किया है और उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट, आईटी एक्ट समेत अन्य धाराओं में कार्रवाई की बात कही है। कार्रवाई जरूरी है, लेकिन सवाल यह भी है कि पुलिस को घटना की जानकारी कब और क्यों हुई? कहां था उस क्षेत्र का थानेदार और अबतक निलंबित क्यों नहीं हुआ। इसे थानेदार, उस बीट क्षेत्र के इंचार्ज, टोले के चौकीदार की विफलता नहीं मानी जाए, जिसे घटना की भनक नहीं लगी। इन तीनों के साथ अन्य जवाबदेह पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
घटना 19 सितंबर की बताई जा रही है, जबकि 20 सितंबर को वीडियो इंटरनेट पर प्रसारित होने लगा। वीडियो के सामने आने और मामला तूल पकड़ने के बाद पुलिस-प्रशासन सक्रिय हुआ। सवाल यही है कि अगर वीडियो प्रसारित नहीं होता, तो क्या पुलिस को घटना की जानकारी समय रहते मिल पाती?
कानून-व्यवस्था में पुलिस की अहम जिम्मेदारियों में आसूचना संकलन, अपराध नियंत्रण और विधि-व्यवस्था संधारण शामिल हैं। ऐसे में घटना के बाद दो दिनों तक स्थानीय पुलिस को भनक तक नहीं लगना गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर आसूचना तंत्र इतना कमजोर है कि क्षेत्र में इतनी गंभीर घटना की जानकारी पुलिस तक समय पर नहीं पहुंचती, तो इसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
वीडियो प्रसारित करने वालों पर कार्रवाई अपनी जगह जरूरी है, लेकिन सिर्फ वायरल वीडियो के बाद कार्रवाई से पुलिस की मूल जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। असली सवाल यह है कि घटना को रोकने, समय पर जानकारी जुटाने और पीड़ितों को तत्काल सुरक्षा देने की जिम्मेदारी किसकी थी? नाबालिग से जुड़ी घटना का वीडियो प्रसारित करना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। ऐसे वीडियो को शेयर करने के बजाय उसकी सूचना पुलिस को देना ही जिम्मेदार नागरिकता है।


