वक्त बीतता गया, चेहरे बदलते गए और जिंदगी आगे बढ़ती रही, लेकिन जमुई के प्रतापपुर के एक परिवार के लिए 23 साल पहले थमा वह दर्द शायद आज भी वहीं खड़ा है। दो सगे भाइयों डीपी यादव और पूणा यादव की हत्या के बाद शुरू हुई इंसाफ की तलाश अब एक बार फिर पुलिस की कार्रवाई के साथ चर्चा में है। वर्षों से फरार आरोपितों के घर पुलिस ने न्यायालय के निर्देश पर इश्तिहार चस्पा किया है। इस कार्रवाई ने पुराने जख्मों को कुरेदा जरूर है, लेकिन साथ ही पीड़ित परिवार की बुझती उम्मीदों में इंसाफ की एक नई लौ भी जलाई है।
वर्ष 2003 में जमुई के प्रतापपुर में हुए दोहरे हत्याकांड ने इलाके को झकझोर दिया था। दो सगे भाइयों की हत्या के मामले में कई लोगों को नामजद आरोपित बनाया गया। कुछ आरोपितों के विरुद्ध न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन कुछ आरोपित लंबे समय तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहे। समय की धूल में यह मामला धीरे-धीरे दबता चला गया।
अब 23 साल बाद सदर थाना पुलिस ने फरार आरोपित मुकेश यादव उर्फ माको यादव, महेश यादव और राजेंद्र यादव के घर इश्तिहार चस्पा किया है। पुलिस के अनुसार यह कार्रवाई न्यायालय की प्रक्रिया के तहत की गई है। इश्तिहार के बाद भी आरोपित न्यायालय में उपस्थित नहीं होते हैं तो आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
जब बेटे की करतूत ने फिर खोल दी पिता की फाइल
इस पुराने मामले में पुलिस की सक्रियता उस समय और चर्चा में आई, जब हाल में गनौरी यादव की गिरफ्तारी हुई। पुलिस अब पुराने केस रिकॉर्ड और फरार आरोपितों तक पहुंचने के संभावित रास्तों को खंगाल रही है।
इसी घटनाक्रम ने उस परिवार के दर्द को फिर सामने ला दिया है, जिसने 23 वर्ष पहले अपने दो सगे बेटों को खोया था। जिन माता-पिता ने अपने जवान बेटों की मौत के बाद न्याय के लिए वर्षों तक इंतजार किया होगा, उनके लिए हर गुजरता साल किसी लंबी सजा से कम नहीं रहा होगा। न्याय की आस में दर-दर भटकना और फिर समय के साथ उम्मीद का कमजोर पड़ जाना—यह दर्द किसी कागजी केस डायरी में दर्ज नहीं होता।
लेकिन जिंदगी ने एक अजीब मोड़ लिया। जिस परिवार के दो बेटों की हत्या का मामला वर्षों से ठंडे पड़े पन्नों में दबा था, उसी मामले से जुड़े एक आरोपित के परिवार में सामने आई दूसरी आपराधिक घटना के बाद पुलिस की नजर फिर पुराने मामले की ओर गई। इसके बाद 23 साल पुरानी फाइल दोबारा खुली और फरार आरोपितों के घर तक पुलिस पहुंची।
देर से सही, उम्मीद तो लौटी
किसी मां-बाप से पूछिए कि बेटे को खोने के बाद न्याय का इंतजार कैसा होता है। अदालत की तारीखें, पुलिस की कार्रवाई और हर बार लौटती उम्मीद के बीच बीतते साल शायद उनके लिए कैलेंडर के पन्ने नहीं, बल्कि दर्द की परतें रहे होंगे।
डीपी और पूणा यादव अब लौटकर नहीं आएंगे। 23 वर्ष पहले छूटा परिवार का वह हिस्सा आज भी खाली है। लेकिन पुलिस की मौजूदा कार्रवाई ने कम से कम यह संदेश दिया है कि पुरानी फाइल हमेशा के लिए बंद नहीं हुई है।
समय ने घाव भले ही पुराने कर दिए हों, लेकिन इंसाफ की उम्मीद अभी जिंदा है। 23 साल बाद घर की दीवार पर चस्पा हुआ इश्तिहार सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि उन स्वजनों के लिए उस इंतजार की दस्तक भी है, जो शायद वर्षों से पूछते रहे होंगे—आखिर उनके बेटों की मौत का इंसाफ कब होगा?


